Saturday, 3 March 2012

कविता


घर आये परदेशी बालम
देखी खाली खोली
आस-पडोस में हाक लगायें
कहां गई मोरी भोली
एक रंगीला हंसकर बोला
मौसम रंग-रंगोली
मुंह में डाल अंगूठा चूसो
भोली यार की हो ली!

गद्य-पद्य रंग कर्म समेटे
है बसंत की झोली
बुद्धिहीन हुडदंग मचाने
ले निकले गदहों की टोली!!

समस्त देशवासीयों को होली की अग्रिम शुभकामनाएं।

Monday, 10 October 2011

नमन...

गजल सम्राट जगजीत सिंह को कवि बुद्धिहीन का नमन...
 

गिरने दो आंखों से आंसू मेरे पापों का प्रतिफल है
गर बच गया अंस थोड़ा भी अगले जनम बहाना होगा
बोझ उठाये पीड़ का जो जीवन जीता हूं मैं अब तक 
खत्म न हो गर कष्ट जनम का अगले जनम उठाना होगा!
दोषी नहीं भाग्य ना भगवन यह कर्मों की रेखा है
पल-पल रंग बदलता जीवन मैंने अपना देखा है
जीवन में खुशियों का मेरे बहुत बड़ा दुर्भिक्ष पड़ा है
सीना ताने आगे मेरे रोक रास्त दर्द खड़ा है
गम के संग हंसते-हंसते खुद का दर्द छुपाना होगा!


नहीं चाहिए मुझे किसी के स्नेह लेप संबंधों का
सहा नहीं जाता कसाव झूठे अपने पन के फंदों का
सच मेरे जीवन का है कि खोया है मैं वंश
परिभाषित जैसे जो कर ले पर सहता हूं विछोह का दंश
दर्द ही अब नियत जीवन का सबको सत्य बताना होगा
खत्म ना हो पापों जीवन का अगले जनम भोगना होगा।

गिरने दो आंखों से आंसू मेरे पापों का प्रतिफल है
गर बच गया अंस थोड़ा भी अगले जनम बहाना होगा!

Sunday, 25 September 2011

बरसे बदरिया


घेरी बरसे बदरिया घर ना आये बलमू
कइली सोहलो सिंगार हम केसे करीं प्यार
अंखिया लोरवा गिरे ला जइसे बरखा भार
पिया बिन जिया नाहीं लागे तरसावे बलमू
बहे झोर पुरवाई अंग-अंग अंगडाई
चमके चउंदिस बिजुरिया डरावे बलमू
अंगना भर गइले पानी दूजे चढ़ली जवानी
सारी रात गिरे पानी हम होईं पानी-पानी
मोरे जिनगी पानी बचावे बलमू
बरखा होला झकझोर, उठे जिया में हिलोर
अंखिया नींद नाहिं आवे बैठल होई गइले भोर
कइसों भोरे आंख लागल डर मनवा से भागल
मोहें सपना में गरवा लगावे बलमू
मोरी टूटही पलानी टप-टप टपके ला पानी
कइसे मिली रोटी-पानी ना बुझाला बलमू।
विजय बुद्धिहीन

Thursday, 22 September 2011

लौट आयेंगे आप


गर कभी घिर जायें गरदिश के गुबार में
याद कर बदकिस्मती मेरी उबर जायेंगे आप।
जब कभी चलते-चलते पांव में कांटे चुभे
जख्म भरा जिस्म मेरा देख सम्भल जायेंगे आप
जिन्दगी से रूठ कर गर आपने छोड़ है घर
देख घायल जिन्दगी मेरी लौट आयेंगे आप!!

Wednesday, 21 September 2011

लिख जाता है

गीत लिखूं तो दर्दे दिल
जाने क्यों लिख जाता है
गजल लिखूं तो मजलूमों की
आंसू खुद लिख जाता है।

व्यंग लिखूं तो आग पेट की
कागज पर मौजूद मिले
लिखूं हास्य तो अपने पर
केवल लिख जाता है।

प्यार लिखूं तो लिख जाता है
अपनों से धोखा की बातें
लिखूं समर्पण की अभिलाषा
हाथ स्वयं रूक जाता है।

Thursday, 1 September 2011

छोड़ो सोचना

कल का जीवन धोखा है 

 


जीना मुश्किल आज हो रहा
कल को किसने देखा है

आज का जीवन सत्य तुम्हारा
कल का जीवन धोखा है

हंस लो गा लो, गले लगा लो
रूठे को तुम आज मना लो

जो हो तुमसे दूर तुम्हारे
कर निवेदन पास बुला लो

धो लो मन के कलुष आज ही
मतभेदों को आज मिटालो

छोड़ों ना कुछ भी कल पर
सारे काम आज निपटा लों

कभी नहीं आता कल अपना
रहता आज हेशा संग

कल के आशा जो है रहता
जीवन भर वो लड़ता जंग

छोड़ो सोचना भूत काल की
वर्तमान का साथ निभालों!


जीना मुश्किल आज हो रहा
कल को किसने देखा है

आज का जीवन सत्य तुम्हारा
कल का जीवन धोखा है
!

Sunday, 8 May 2011

गांव की यादें

अपना छोटा गांव

बार-बार है मुझे बुलाता
अपना छोटा गांव
पनघट की वो हंसी ठिठोली
और बरगद की छांव।
                बार-बार....

नदी की लहरों पर बलखाती
छोटी-छोटी नांव
दादा जी की गोद में बैठकर
जपना निश दिन हरिनाम
थक कर चूर आयें घर वापस
मां दबाये पांव।
                बार-बार....

गायों के संग जंगल जाना
भरी दोपहरी नदी नहाना
झरबेरी के कांटों का
चुभना अपने पांव।
                बार-बार....

सावन में सूरज का बदली में छुप-छुप कर
एक पलक में धूप दिखाना एक पलक में छांव
शाम ढले बसवार में गौरैयों का खूब चहकना
सुबह संदेशा मामा का लावे कांव
बार-बार है हमें बंलाता
अपना छोटा गांव।

बुद्धिहीन

आज पहली बार ब्लाग की दुनियां में कदम रख रहा हू। सोचा इसकी शुरूवात गांव से ही करूं जहां मस्ती, अल्हडपन भरा जीवन बीता है। गांव की यादें शहर में आने के बाद अक्सर आता रहता है। मगर सवाल पेट का है, फिर वो बरगद, बलखाती नदी की धारा पर नावों का मचलना सब याद आता रहता है।