Wednesday, 21 September 2011

लिख जाता है

गीत लिखूं तो दर्दे दिल
जाने क्यों लिख जाता है
गजल लिखूं तो मजलूमों की
आंसू खुद लिख जाता है।

व्यंग लिखूं तो आग पेट की
कागज पर मौजूद मिले
लिखूं हास्य तो अपने पर
केवल लिख जाता है।

प्यार लिखूं तो लिख जाता है
अपनों से धोखा की बातें
लिखूं समर्पण की अभिलाषा
हाथ स्वयं रूक जाता है।

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