Sunday, 25 September 2011

बरसे बदरिया


घेरी बरसे बदरिया घर ना आये बलमू
कइली सोहलो सिंगार हम केसे करीं प्यार
अंखिया लोरवा गिरे ला जइसे बरखा भार
पिया बिन जिया नाहीं लागे तरसावे बलमू
बहे झोर पुरवाई अंग-अंग अंगडाई
चमके चउंदिस बिजुरिया डरावे बलमू
अंगना भर गइले पानी दूजे चढ़ली जवानी
सारी रात गिरे पानी हम होईं पानी-पानी
मोरे जिनगी पानी बचावे बलमू
बरखा होला झकझोर, उठे जिया में हिलोर
अंखिया नींद नाहिं आवे बैठल होई गइले भोर
कइसों भोरे आंख लागल डर मनवा से भागल
मोहें सपना में गरवा लगावे बलमू
मोरी टूटही पलानी टप-टप टपके ला पानी
कइसे मिली रोटी-पानी ना बुझाला बलमू।
विजय बुद्धिहीन

Thursday, 22 September 2011

लौट आयेंगे आप


गर कभी घिर जायें गरदिश के गुबार में
याद कर बदकिस्मती मेरी उबर जायेंगे आप।
जब कभी चलते-चलते पांव में कांटे चुभे
जख्म भरा जिस्म मेरा देख सम्भल जायेंगे आप
जिन्दगी से रूठ कर गर आपने छोड़ है घर
देख घायल जिन्दगी मेरी लौट आयेंगे आप!!

Wednesday, 21 September 2011

लिख जाता है

गीत लिखूं तो दर्दे दिल
जाने क्यों लिख जाता है
गजल लिखूं तो मजलूमों की
आंसू खुद लिख जाता है।

व्यंग लिखूं तो आग पेट की
कागज पर मौजूद मिले
लिखूं हास्य तो अपने पर
केवल लिख जाता है।

प्यार लिखूं तो लिख जाता है
अपनों से धोखा की बातें
लिखूं समर्पण की अभिलाषा
हाथ स्वयं रूक जाता है।

Thursday, 1 September 2011

छोड़ो सोचना

कल का जीवन धोखा है 

 


जीना मुश्किल आज हो रहा
कल को किसने देखा है

आज का जीवन सत्य तुम्हारा
कल का जीवन धोखा है

हंस लो गा लो, गले लगा लो
रूठे को तुम आज मना लो

जो हो तुमसे दूर तुम्हारे
कर निवेदन पास बुला लो

धो लो मन के कलुष आज ही
मतभेदों को आज मिटालो

छोड़ों ना कुछ भी कल पर
सारे काम आज निपटा लों

कभी नहीं आता कल अपना
रहता आज हेशा संग

कल के आशा जो है रहता
जीवन भर वो लड़ता जंग

छोड़ो सोचना भूत काल की
वर्तमान का साथ निभालों!


जीना मुश्किल आज हो रहा
कल को किसने देखा है

आज का जीवन सत्य तुम्हारा
कल का जीवन धोखा है
!