Sunday, 8 May 2011

गांव की यादें

अपना छोटा गांव

बार-बार है मुझे बुलाता
अपना छोटा गांव
पनघट की वो हंसी ठिठोली
और बरगद की छांव।
                बार-बार....

नदी की लहरों पर बलखाती
छोटी-छोटी नांव
दादा जी की गोद में बैठकर
जपना निश दिन हरिनाम
थक कर चूर आयें घर वापस
मां दबाये पांव।
                बार-बार....

गायों के संग जंगल जाना
भरी दोपहरी नदी नहाना
झरबेरी के कांटों का
चुभना अपने पांव।
                बार-बार....

सावन में सूरज का बदली में छुप-छुप कर
एक पलक में धूप दिखाना एक पलक में छांव
शाम ढले बसवार में गौरैयों का खूब चहकना
सुबह संदेशा मामा का लावे कांव
बार-बार है हमें बंलाता
अपना छोटा गांव।

बुद्धिहीन

आज पहली बार ब्लाग की दुनियां में कदम रख रहा हू। सोचा इसकी शुरूवात गांव से ही करूं जहां मस्ती, अल्हडपन भरा जीवन बीता है। गांव की यादें शहर में आने के बाद अक्सर आता रहता है। मगर सवाल पेट का है, फिर वो बरगद, बलखाती नदी की धारा पर नावों का मचलना सब याद आता रहता है।