नमन...
गजल सम्राट जगजीत सिंह को कवि बुद्धिहीन का नमन...
गिरने दो आंखों से आंसू मेरे पापों का प्रतिफल है
गर बच गया अंस थोड़ा भी अगले जनम बहाना होगा
बोझ उठाये पीड़ का जो जीवन जीता हूं मैं अब तक
खत्म न हो गर कष्ट जनम का अगले जनम उठाना होगा!
दोषी नहीं भाग्य ना भगवन यह कर्मों की रेखा है
पल-पल रंग बदलता जीवन मैंने अपना देखा है
जीवन में खुशियों का मेरे बहुत बड़ा दुर्भिक्ष पड़ा है
सीना ताने आगे मेरे रोक रास्त दर्द खड़ा है
गम के संग हंसते-हंसते खुद का दर्द छुपाना होगा!
नहीं चाहिए मुझे किसी के स्नेह लेप संबंधों का
सहा नहीं जाता कसाव झूठे अपने पन के फंदों का
सच मेरे जीवन का है कि खोया है मैं वंश
परिभाषित जैसे जो कर ले पर सहता हूं विछोह का दंश
दर्द ही अब नियत जीवन का सबको सत्य बताना होगा
खत्म ना हो पापों जीवन का अगले जनम भोगना होगा।
गिरने दो आंखों से आंसू मेरे पापों का प्रतिफल है
गर बच गया अंस थोड़ा भी अगले जनम बहाना होगा!
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